Sunday, 11 December 2016

Episode - 4

निशा ने मुस्कुराकर कहा- मैं निशा हूँ। मै रोज़ यहीं आकर बेठती हूँ।तुम्हे तो पहले कभी यहां देखा ही नही। समीर- मैं बस यहां पक्षियों को देखने आता हूँ। और वो धूप से बचने के लिए दिन मे पानी का सहारा लेते हैं। उस समय यहां कोई नही होता। वैसे आज इस समय पर कैसे आना हुआ तुम्हारा? निशा - मुझे जिस भी पल शांति चाहिए होती है।और मैं खुदके साथ समय बिताना चाहती हूँ।तो मैं यहां आ जाती हूँ। समीर- और वो आसुं!अनमोल बूंदों को क्यों बहा रही थी तुम! बताओ कोई तकलीफ हो तो ? निशा- मैं ठीक हूँ !कुछ नही हुआ। अच्छा मैं चलती हूँ। माँ घर पर इंतज़ार कर रहीं होगी। समीर- फिर मिलेंगे। निशा - पक्षियों के पास, सुंदर नज़ारों के बीच कभी मौका आया तो ज़रूर मिलेंगे। निशा मन ही मन बहुत खुशी महसूस कर रही थी। आप यह ना समझे की यह प्यार है!और यह भी नही की अब यह कहानी प्रेम दर्शाएगी। हम आपको किसी और ही यात्रा पर लेकर जाने वाले हैं। निशा घर पहुच कर अपनी माँ के पास बेठ जाती है। माँ उसकी खुशी का कारण पूछती है। निशा - कुछ नही माँ। कॉलेज से निकली थी तब बहुत गुस्से मे थी। तालाब किनारे बैठने से अच्छा महसूस हो रहा है। माँ- प्राकृतिक सौंदर्य से ज़्यादा शांति ,मन को कोई नही दे सकता निशा। निशा बस सिर हिला देती है। आगे कुछ नही कहती।क्योंकि उसकी खुशी की वजह कुछ और ही थी। अगले दिन निशा को कॉलेज मे शानु मिलती है। शानु- कब तक गुस्सा रहेगी यार। रात को मैसेज का रिप्लाय भी नही दिया तूने। निशा- जब दोस्त आपके दुश्मनों से हाथ मिला लें तो वो आपके दोस्त नही रह जाते। उनमे कहीं न कहीं से आपसे विपरीत विचार आने लगते हैं।तो ऐसे दोस्त होने से अच्छा मैं अकेली ही रह लूंगी। शानु- नही यार !ऐसा नही है। शुभ दिल का अच्छा है। बस यहाँ उसके बाकी दोस्तो के बहकावे मे आकर गलत काम कर देता है। कल उसने बताया की मुझसे बस दोस्ती ही चाहता है। कोई गलत इरादा नही है उसका। निशा- दोस्ती से महंगी घड़ी का क्या रिश्ता है? दोस्ती से बिस्तर तक के बीच ज़्यादा दूरी नही रह जाती। घड़ी फिर गुलाब और उसके बाद दो तीन सरप्राइज़ बस ,उसके बाद तु उसे मना नही कर पाएगी। तु केसे किसी के चंगुल मे इतनी आसानी से आ सकती है? छोड़!तुझे समय आने पर ही पता चलेगा। मैं जा रही शानु। दुआ करूंगी की तुझे जल्दी समझ आ जाए । शानु- मैं गलत नही कह रही निशा। सुन तो! निशा उसकी बातों को अनसुना कर चली जाती है। शांति के लिए वो लाइब्रेरी जाती है और पेड़- पोधो के बारे मे पढ़ने लगती है। कुछ देर बाद! - क्या पढ़ रही हो? निशा को जानी पहचानी आवाज़ सुनाई देती है। उसने पलटकर देखा। समीर उसके पीछे खड़ा था। निशा उसे वहां देखकर चकित रह गयी। निशा- तुम यहा क्या कर रहे हो? आस पास के लोग उसे घूरने लगे।निशा ने बाहर चलने का इशारा किया। निशा- तुम मेरे कॉलेज मे क्या कर रहे हो? समीर- मैं यही से पार्ट टाइम समर कोर्स कर रहा हूँ। निशा- अच्छा हुआ तुम मिल गए। चलो कॉफी पीने चलते है| समीर - थोड़ी देर बाद मिलते है।अभी मुझे कुछ काम है।जल्दी वापस आऊंगा। निशा - मैं यही आस पास ही रहूंगी। आ जाना तुम समीर निकल जाता है। निशा उसका इंतज़ार करने लगती है।उसे महसूस होता है की शानु को शुभ से बचाना उसका ही काम है। वो शानु को बर्बाद होने के लिए नही छोड़ सकती। कॉलेज लाइफ मे अक्सर सुनने को मिलता है की आज़ादी पाकर जोड़े अपनी हदे पार कर देते है। रिश्ता तो ज़्यादा दिन नही टिकता।पर उससे हुए नुकसान ताउम्र आपका पीछा नही छोड़ते। इसीलिए हमेशा आगे का सोचकर ही कोई कदम उठाना चाहिए।जिससे बाद मे आपके माता-पिता को शर्मसार न होना पड़े। समीर- तुम बार-बार कहाँ खो जाती हो।क्या हो गया अब! निशा- कैंटीन चलते है।फिर बात करेंगे। समीर- चलो फिर! केन्टीन पहुचकर दोनो एक कोने मे जाकर बेठ गए। समीर- अब बताओ।क्या हुआ? इतनी आसानी से निशा किसी से अपनी निजी ज़िन्दगी की बातें नही करती ।इसीलिए उसे टाल देती है। निशा- जाने दो।कुछ नही ।तुम काफी पिओगे? समीर- मेंने अभी पी है।तुम ही पीलो निशा काफी लेकर बैठ जाती है। तुम्हारे घर मे कौन- कौन है? समीर- मेरे घर मे मैं ,जिगर ,पवन और नीरव है। निशा- इतने सारे भाई है तुम्हारे? समीर- नही तुम गलत समझ रही हो।जिगर खरगोश है, पवन मेरा तोता और नीरव मेरे कछुए का नाम है। निशा-(हस्ते हुए) यह तो बहुत ही अच्छा परिवार है तुम्हारा। ना कोई ज़्यादा काम, ना ही दूसरों के खाने पीने की चिंता। समीर- हां!वो तो है पर मेरा घर यहा से 200किमी दूर पंजाब मे है। वहां मेरा पूरा परिवार है।वहा सब साथ रहते है। अब बताओ तुम! क्यों इतनी दुखी रहती हो? दुखी रहना होबी है क्या तुम्हारी? निशा- नही तो ! मेरी होबी तो भारतीय लेखको की कहानी कविता पढना है। समीर- भारतीयों को कौन पड़ता है आजकल!फॉरेन राइटर्स का जमाना है यह तो। निशा- मेरा मानना है की अगर हम भारतीय ही हिन्दी या भारतीय लेखको को नही पढ़ेंगे।तो हमारे लेखक बनने के बाद हमारी रचनाओं को कौन पढ़ेगा। हमे अपनी मातृभाषा की रक्षा स्वयं करनी पड़ेगी।इसीलिए मैं भारतीय लेखको को ज़्यादा पसन्द करती हूँ। और जहां तक दुखी होने की बात है,दुखी रहने का शौक किसे हो सकता है? जब परेशानियों और कठनाइयों के कारण आगे के रास्ते दिखने बन्द हो जाते है। तो मैं अक्सर ऐसे ही सोच मे पड जाती हूँ। समीर-(टोकते हुए) मैं कुछ मदद करूँ? जारी......

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